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कण-कण में रावण

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कण-कण में रावण

Post by KULDEEP BIRWAL on Sun Oct 28, 2012 9:33 pm

कण-कण में रावण रावण का निरपेक्ष मूल्यांकन तभी संभव है, जब हम रामायण के कथाक्रमों से अलग होकर तटस्थ रूप से सोचें। रावण के पुतला दहन के पीछे भी यही संदेश है कि आने वाली पीढ़ी को याद रहे कि सृष्टि के नियम के विरुद्ध काम करने पर सजा मिलती है। उसी तरह देवों का गुणगान भी सत्य और धर्माचरण की जीत का प्रतीक है। ऐसा हर काल में देखा गया है कि जहां कण-कण में राम हैं, वहीं कण-कण में रावण भी विद्यमान है । दोनों वृत्तियों के गुण बराबर मात्रा में होने के कारण देव वृत्ति कुछ पल, कुछ वर्ष या युग तक भी असुर द्वारा पराजित होती रहती है लेकिन अंतत: जीत सत्य देव वृत्ति की ही होती है

पंडित अशोक वासुदेव

भारतीय वैदिक सभ्यता में युगों (सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग) के अनुसार पूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण पांच तत्वों द्वारा निर्मिंत (अ- उ- म) में निहित है। यह अ-कार, ई-कार और म-कार यानी तीन मनोवृत्तियों के द्वारा योग-माया के रूप में पांच विकार- काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार के माध्यम से व्याप्त है। सूक्ष्म शरीर के अन्दर म-कार, ईष्र्या एवं द्वेष निहित होता है। जिस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, महेश और देव तत्व कण-कण में व्याप्त हैं, उसी प्रकार असुर भी बराबर मात्रा में उसी कण-कण में विराजमान हैं। हमारे शरीर में इड़ा और पिंगला नाम की नाड़ियां शुभ और अशुभ, दोनों तत्वों को निरूपित करती हैं। इसी शरीर का मेरुदंड मंदराचल पर्वत एवं देव और असुर के बीच शुष्मना वासुकी नाग के रूप में विद्यमान रहता है। कहने का तात्पर्य इतना है कि जहां कण-कण में राम हैं, वहीं कण-कण में रावण विद्यमान है। दोनों वृत्तियों के गुण बराबर मात्रा में होने के कारण देव वृत्ति कुछ पल, कुछ वर्ष या युग तक भी असुर द्वारा पराजित होती रहती है, जो अहंकार, ईष्र्या और द्वेष देवगुण में निहित है, वही गुण असुर में भी है परन्तु असुर तब पराजित होते हैं. जब वे ब्रह्माजी द्वारा बनायी गयी सृष्टि में अपनी सुविधानुसार या विचारानुसार भिन्न आचरण करने की चेष्टा करने लगते हैं। देवगुणों से भरपूर प्राणी अपने प्रारब्ध द्वारा कई बार जन्म लेने के पश्चात असुर को सृष्टि से मिटा पाता है परन्तु असुर का बीज कहीं न कहीं सृष्टि में विद्यमान रहता है और अवसर आने पर फिर पनपता है। इसीलिए शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि बचे हुए राक्षस पाताललोक चले जाते हैं। दो राजवंशों की कथा समझे बिना रावण के अहंकार की व्याख्या अधूरी रह जाएगी।

कौशल राजवंश

कौशल का राजघराना सूर्यवंशी कहलाता था, जिसके श्रीराम सबसे प्रतापी राजा हुए। सरयू नदी के किनारे स्थित इस देश की राजधानी अयोध्या थी। इसके अड़तीसवें राजा अज हुए, जो पत्नी इंदुमती के असामयिक निधन के वियोग में स्वर्ग सिधार गए। उस समय अज के पुत्र की उम्र मात्र आठ माह थी, तभी राजगुरु वशिष्ठ ने सबसे बुद्धिमान मंत्री सुमंत को राजा अज के सुपुत्र के नाम पर शासन चलाने को कहा। जब बालक 18 वर्ष का हुआ तो उसने खुद राजकाज संभाल लिया और दशरथ के नाम से मशहूर हुए। उत्तर कोैशल के राजा सूर्यवंश के ही दूसरे राजा थे। वे राजा दशरथ की प्रभुता स्वीकार करने को राजी हो गए। उनकी सुपुत्री कौशल्या खूबसूरत राजकुमारी थी, जिससे राजा दशरथ विवाह करना चाहते थे। इसकी भनक लगते ही लंकाधिपति रावण अत्यंत क्रोधित हुआ क्योंकि वह स्वयं कौशल्या से विवाह कर अपना साम्राज्य विस्तार चाहता था। क्रोधित होकर उसने कौशल्या की हत्या की योजना बनाई लेकिन पत्नी मंदोदरी के निवेदन पर स्त्री हत्या के पाप से बचने के लिए उसने अपने कुछ आदमी कौशल्या के अपहरण के लिए भेजे और कहा कि कौशल्या को बक्से में बंद कर सरयू नदी में बहा दें। इसी बीच, राजा दशरथ विजय अभियान पूरा कर, सरयू नदी पार कर रहे थे तभी उनकी नजर उस बक्से पर पड़ी, जिसमें कौशल्या बह रही थीं। दशरथ कूद पड़े उस बक्से को बचाने के लिए लेकिन तैरते-तैरते वे काफी थक चुके थे। तब गिद्धराज जटायु (जो प्रजापति कश्यप और विनता के पुत्र अरुण -सूर्य के सारथि के पुत्र) ने राजा की रक्षा की। इसके बाद जटायु, दशरथ और कौशल्या अयोध्या आये, जहां राजा दशरथ और कौशल्या का विवाह बड़ी धूमधाम से संपन्न हुआ।

शांति : राम की बड़ी बहन शीघ्र ही कौशल्या ने एक विकलांग पु त्री को जन्म दिया। इससे पूरा राजपरिवार शोकाकुल हो गया। राजवैद्यों के लाख प्रयास के बावजूद पुत्री को ठीक नहीं किया जा सका। इसका कारण समान गोत्र में विवाह होना बताया गया। तब सभी की सलाह पर राजा दशरथ ने शांति को अंगदेश के राजा सोमपद को संरक्षण-पोषण के लिए सौंप दिया, जहां शांति की विकलांगता धीरे -धीरे दूर हो गयी और उसका विवाह ऋषि श्रृंग से हुआ। स्वस्थ संतान की चाहत में राजा दशरथ ने सुमित्रा और कैकेयी से विवाह किया, फिर भी संतान नहीं हुई। तब साधु-संतों की सलाह पर पुत्र-कामेष्ठी यज्ञ कराया गया, जिसे दशरथ के दामाद ऋषि श्रृंग के नेतृत्व में संपन्न कराया गया।

कैकेयी वह कोैशल राज के सहयोगी शक्तिशाली राजा अश्वपति की पुत्री थी। कैकेयी का विवाह राजा दशरथ से इसी शर्त पर हुआ कि उसके गर्भ से उत्पन्न बालक ही अयोध्या का राजा बनेगा। दशरथ को भी इसमें कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि कौशल्या को दूसरी संतान नहीं हो रही थी। बाद में वर्षो तक जब कैकेयी भी मां न बन सकीं तो दशरथ ने मगध साम्राज्य की राजकुमारी सुमित्रा से विवाह कर लिया। इन विवाहों के माध्यम से कैकेय, मगध और उत्तर कौशल राजा दशरथ के नियंतण्रसंधि में आ गये। कालांतर में विभिन्न कारणों से कैकेयी की पकड़ दशरथ पर बढ़ गयी। समय के साथ तीनों रानियां मातृत्व सुख को प्राप्त हुई। श्रीराम कौशल्या के पुत्र थे।

सयं बन को लंका का प्रथम राजा माना जाता है जो अपने आपको मनु का वंशज मानता था। उसने 33 वर्ष शासन किया। तिरु कोनामलाई उसकी राजधानी थी। सयंबन का दामाद यालिमुगन राजगद्दी पर बैठा, जिसने दस वर्षो तक शासन किया। यालिमुगन का पुत्र हेति गद्दी पर बैठा, जिसने राजधानी बदलकर मुरुगापुरम कर दी और 28 वर्षो तक शासन किया। इसके बाद हेति और रानी भाया के पुत्र विन्तुकेशन ने 29 वर्षो तक राज किया। उसका विवाह सलकंतकता से हुआ और एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम सुकेश था। सुकेश या सुकेशन ने 41 वर्षो तक राज किया लेकिन राजधानी बनाई कठिरावणमलई। गन्धर्वपुत्री ग्रामणी से सुकेश का विवाह हुआ, जिससे तीन पुत्र हुए- मलयवन, सुमाली और माली। हारा माली का पुत्र था, जो रावण की मृत्यु के बाद विभीषण का मंत्री बना। मलयवन सुकेश के बाद गद्दी पर बैठा और खूबसूरत राजधानी इलंकापुरी बनायी, जहां उसने 21 वर्षो तक शासन किया। मलयवन के बाद उसका भाई सुमाली गद्दी पर बैठा लेकिन कुल साढ़े पांच साल के शासन के बाद ही जन विद्रोह द्वारा उसे हटा दिया गया। सुमाली की पुत्री कैकेशी अभी बच्ची थी और सत्ता संभालने लायक नहीं हुई थी। बाद में सुमाली की भी हत्या कर दी गयी। कालांतर में ऋषि विश्रवा से कैकेशी का विवाह हुआ जिससे तीन पुत्र उत्पन्न हुए- रावण, कुम्भकरण और विभीषण तथा एक पुत्री शूर्पनखा हुई। बाद में रावण ने लंका को पुन: अपने कब्जे में ले लिया और राजा बन बैठा। रावण का प्रधानमंत्री प्रहस्त था। उसने कैलाश पर्वत पर मणिभद्र को हराया था और लंका के पूर्वी छोर का सेनापति बना। बाद में नील ने उसकी हत्या कर दी। प्रहस्त ने रावण की सेना का नेतृत्व कर यम और कुबेर के खिलाफ हुए युद्ध में भी हिस्सा लिया और रावण का साम्राज्य फैलाया था। प्रहस्त ने ही श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव और वानर सेना से शुरुआती लोहा लिया था। मेरु पर्वत के समीप तृणविन्दु ऋषि रहते थे। एक बार उनकी पुत्री जंगल में घूमते हुए पुलस्त्य ऋषि के आश्रम पहुंच गई और इनसे गर्भवती हो गई। इनके दो पुत्र हुए विश्रवा या वाचिरवायु और अगस्त्य। विश्रवा का विवाह भारद्वाज की पुत्री देववर्णी से हुआ और कुबेर उत्पन्न हुए, जो लंका के राजा बने। कुबेर का विवाह कौवेरी से हुआ, जिससे दो पुत्र उत्पन्न हुए- मणिग्रीव और नलकुबेर। बाद में रावण ने कुबेर को हरा दिया। इस तरह उसने कैलाश पर शरण लेनी पड़ी। रम्भा नलकुबेर की पत्नी थी। यह सुंदरी नृत्य-संगीत में निपुण थी, जो प्राय: इंद्र के कहने पर साधु-संतों की तपस्या भंग किया करती थी। एक बार विश्वामित्र की तपस्या भंग करने की कोशिश में रम्भा को अपमानित होना पड़ा था। रावण भी रम्भा के इंद्र की सेवा में रहने पर कुपित रहता था इसलिए उसे अपमानित करता था। राजा माया ने हेमा नामक अप्सरा से विवाह किया। हेमा ने खूबसूरत पुत्री मंदोदरी को जन्म दिया, जिससे बाद में रावण का विवाह हुआ। हालांकि रावण की कई रानियां थीं लेकिन उनमें मंदोदरी का स्थान सदैव श्रेष्ठ था और वह रावण को न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहती थी। एक और बात, उस काल में यज्ञ के स्वरूप में काफी भिन्नताएं मिलती हैं। लं का साम्राज्य में स्त्रियां रावण के पुतला दहन के पीछे सं देश है कि आने वाली पीढ़ी को याद रहे कि सृष्टि के नियम के विरुद्ध काम करने पर सजा मिलती है

सुमित्रा इनके दो पुत्र हुए- लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न। लक्ष्मण हमेशा श्रीराम के साथ रहते थे और शत्रुघ्न हमेशा भरत के साथ। शत्रुघ्न की पत्नी का नाम श्रुतकृति था, जो राजा जनक के छोटे भाई कुशध्वज की पुत्री थी। श्रुतकृति की बहन मांडवी भरत की पत्नी थीं। कुशध्वज सांकाश्यपुरी के राजा थे।

रावण के पुतला दहन के पीछे भी यही संदेश है कि आने वाली पीढ़ी को याद रहे कि सृष्टि के नियम के विरुद्ध काम करने पर सजा मिलती है

कहीं घी, अनाज से यज्ञ संपन्न होता था तो कहीं पशुवध, पशु चर्बी आदि से। यहां तक कि अश्वमेघ और नरमेघ यज्ञ भी होते थे। अब सवाल उठता है कि रावण और उसके सहयोगी राक्षस क्यों कहलाते थे? इस संबंध में एक मत है कि ये लोग अनैतिक पशु बलि या नर बलि के यज्ञ में प्रयोग के खिलाफ रक्षा करते थे। ये साधु-संतों को तंग नहीं करते थे, बल्कि यज्ञ में पशु या नर की बलि को रोकते थे। वैसे तो कैकेयी आदि कई चरित्र हैं, जिनके गहन अध्ययन से और भी कई तथ्य सामने आते हैं। इस काल में वैदिक लोकाचार और लंका के लोकाचारों में समानता और अं तर भी देखने को मिलता है। दूसरी मूल बात दंडकारण्य में सीता के अपहरण को केन्द्रीय कथा बनाकर हमें सामाजिक शिक्षा देने का प्रयास किया गया है। रावण के पुतला दहन के पीछे भी यही संदेश है कि आने वाली पीढ़ी को याद रहे कि सृष्टि के नियम के विरुद्ध काम करने पर सजा मिलती है । उसी तरह देवों का गुणगान भी सत्य और धर्माचरण की जीत का प्रतीक है। लोक- परलोक, स्वर्ग-नर्क सभी कर्मो के फल हैं अच्छे कर्मो से प्रारब्ध अच्छा होता है, यहां तक कि जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति भी मिल सकती है। रावण का निरपेक्ष मूल्यांकन तभी संभव है, जब हम रामायण के कथाक्रमों से अलग होकर तटस्थ रूप से सोचें। यह भी विडंबना है कि महान बलशाली योद्धा और विभिन्न विषयों का पारंगत शास्त्री होते हुए भी रावण हिन्दू लोकाचार में सबसे घृणित खलनायक के रूप में बदनाम है।

(लेखक प्रसिद्ध ज्योतिषी व वैदिक हिंदू धर्म के विद्वान है
ं)



source : http://www.indiapress.org/gen/news.php/Rastriya_Sahara/
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